गीतिका
*गणपति वंदना*
नित वंदना गजराज की , तुम आदिदेव विशेष हो।
मन आस द्वार लगा झुके, वह नाम एक गणेश हो।।
प्रभु भोर वंदन आरती, मति मूढ़ मंद सुजान हो।
पकवान मोदक भोग का, अवनीश देव नरेश हो।।
मन रोग से भयभीत हो,कर जाप मंत्र विधान हो।
सुचि ज्ञान दान प्रसाद दो, वरदान नाथ दिनेश हो।।
नित एकदंत अराधना,प्रथमाधि नाम जपो मिनी।
अवदान है प्रभु साधना ,तुम दीन बंधु महेश हो।।
रत पाप पुण्य क्रिया करें,बस एक ही अवधारणा।
रमता रहे मन राम में, बस अंत काल सुवेश हो।।
✍️ डॉ सीमा अवस्थी "मिनी"
३६गढ़, भाटापारा