Posts

सवैया छंद

🙏 *गणेश जी को समर्पित*🙏 *महाभुजंगप्रयात सवैया* (२४ वर्ण ८ यगण १२२×८) १- निराकार एका दया कर पुकारें, नहीं साथ कोई सदा हो हमारे। महाकाय देवा विराजो सदा को,  करूँ वंदना आरती मैं सकारे।। खड़ी द्वार तेरे बनी मैं  भिखारी, सवैया लिखें आज साथी हमारे।। करें कामना हो सहारा विधाता, दया साथ होगी लगेंगे किनारे।। २- मनोकामना से दयावान ध्याएँ, हरी दूब सिंदूर केला चढ़ाएँ। करें वंदना नाम लेके उचारें, विधाता सहारा बड़ी आस लाए। पड़े पाँव तेरे तुम्हीं हो सहारा, कभी तो सुनोगे मना के रिझाए। विधाता लिखी लेखनी को सुधारें, निराकार का जाप जो भी कराए।। सीमा अवस्थी,  भाटापारा,

गीतिका

*गणपति वंदना* नित वंदना गजराज की , तुम आदिदेव विशेष हो। मन आस द्वार लगा झुके, वह नाम एक गणेश हो।। प्रभु भोर वंदन आरती, मति मूढ़ मंद सुजान हो। पकवान मोदक भोग का, अवनीश देव नरेश हो।। मन रोग से भयभीत हो,कर जाप मंत्र विधान हो। सुचि ज्ञान दान प्रसाद दो, वरदान नाथ दिनेश हो।। नित एकदंत अराधना,प्रथमाधि नाम जपो मिनी। अवदान है प्रभु साधना ,तुम दीन बंधु महेश हो।। रत पाप पुण्य क्रिया करें,बस एक ही अवधारणा। रमता रहे मन राम में, बस अंत काल सुवेश हो।। ✍️ डॉ सीमा अवस्थी "मिनी"       ३६गढ़, भाटापारा

"उल्लाला छंद विधान" (१००)

*उल्लाला शतकवीर के लिए सृजन* *कलम की सुगंध छंद शाला मंच* *उल्लाला छंद सृजन _  विधा १५/१३ मापनी* 1. *गणेश जी को समर्पित* गणपति वंदन पहले करें, बनते सारे काज है। लंबोदर प्रभु विनती सुनो, रखना मेरी लाज है। *2. माँ शारदे को समर्पित* माता विमला वरदायिनी, जीवन मेरा सार दे। विद्या का देकर ज्ञान माँ, जीवन को आधार दे।। *3 कलम की सुगंध को समर्पित*  नित सीखे नूतन छंद है, मिलता सबका साथ है।  लेखन सुगंध बिखरे यहाँ, रचना कारों के हाथ है।। *4. गुरूदेव विज्ञात जी को समर्पित* गुरुवर विज्ञात महान हैं, देते नित नव ज्ञान हैं। पथ भटके यदि लेखनी देते हर छंद विधान हैं।। *5. स्वयं को समर्पित* अपनी गलती से ज्ञान ले,  करना काम सुधार के। संगत संतो की कर सदा आता ज्ञान निखार के। *६- मानव* करता मानव अभिमान है, झूठी तेरी शान है। मिलना सबको है राख में, मानव तू नादान  है।। *7. बंधन* जीवन पथ काँटों से भरा ,  मिलकर चलना साथ है। आए जाए सुख दुख चले, डोरी प्रभु के हाथ है।  *8. होली*  होली आयी रंगों भरी  बिखरे सुंदर रंग हैं।   सबके मुख पर छलके खुशी,  अपनों के जो संग...

गीत , "मुलाकात के लिए"

याद में तेरी हम कशीदे गढ़ने लगे, तार यादों के बुन हम सँवरने लगे। तुम कब आओगे मुलाकात के लिए, मैंने चाँद रोक रखा है उस रात के लिए। हो नहीं पाई जो मिलकर तुमसे बात, उस अधूरी बात के लिए.. बरसों तरस गई जो आँखें, अश्कों की होती बरसात के लिए। कब आओगे बस इतना बता दो, मन में उठते हर सवालात के लिए। कब तक रोके रखना है चन्दा, जगमगा उठे दीप से मन के हालात के लिए। झूम उठा है मन खुशियों में भर, रैन मिलन की जज़्बात के लिए। कब आओगे तुम मुलाकात के लिए....  ✍️ डॉ सीमा अवस्थी *मिनी* ©®       भाटापारा 

सबकी अपनी राम कहानी

*सबकी अपनी राम कहानी*, दुनिया के मेले में किस्से तो कई हजार। कोई छुपाए दर्द,बाँटता फिरता कोई प्यार। जीना यहाँ बहुत कठिन है करते सब व्यापार। सबकी अपनी राम कहानी जीने का आधार।। कोई किसी के सुख में सुखी है, गढ़ता है परिवार। कोई किसी से बात बात में कर बैठे तकरार। बड़े अजब किस्मत के फन्दे न छूटे घर-बार। अपनी राम कहानी के साझे में रचा बसा संसार।। दुःख सुख जीवन के पहलू हैं, बाकी सब बेकार। जैसा कर्म करोगे वैसा फल है जीवन सार। अलग अलग मौसम करते हैं, जग में दिन और रात। सबकी अपनी राम कहानी,  जीवन की सौगात।। ✍️ स्वरचित ©®   डॉ सीमा अवस्थी, भाटापारा,३६गढ़। 🙏🙏

जन्मेजय

जन्मेजय (विष्णु) बड़े बड़े विषधर आए हैं, अपना फन फैलाने को, फन दिखाने लगी प्रदर्शिनी, लगा सपेरा लुभाने को, शुरू हुआ जब नाग नृत्य तब, जन्मेजय ने बाजी मारी, हवनकुंड में जा बैठा वो, दोनों एक दूजे पर भारी,। पड़ला देखो किसका होगा तय, पर जन्मेजय का पड़ला भारी। सबने मिलकर किया आह्वान, जन्मेजय का बलिदान करो, अपना वंश बचाने को, किसी का बलिदान करो। एक एक कर वार करें जब, स्वधा समाहित सभी हुए, जन्मेजय की आग में जलाकर, स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए। स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए। इस रचना का चुनावी राजनीतिक परिदृश्य से कोई संबंध नहीं ✍️ सीमा अवस्थी 

*जन्माष्टमी*कान्हा कब तुम आओगे ?दरस को प्यासी तरसे अखियाँ,कब आकर दरस दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ? अब धेनु नहीं कानन जाती,अब कहांँ माखन मिश्री दूध मलाई ?मुरली का जादू भी खो रहा,क्या मुरली अधर लगाओगे? कान्हा कब तुम आओगे ? हर कदम पर दुशासन दुर्योधन ,राह में शीश उठाते हैं।चीर हरण करने को आतुर,एक पल भी न घबराते हैं । शिशुपाल का वध करने को, क्या सुदर्शन चक्र चलाओगे?कान्हा कब तुम आओगे? घर घर हैं धृतराष्ट्र गांधारी,पुत्र प्रेम या सत्ता सुख हो,अनाचार की चलती आरी , क्या दंभी को सद्गमार्ग दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ?समाज हो रहा पथ भ्रमित, मानवता पर प्रपंची घेरा,गीता का ज्ञान सुनाकर,क्या कर्तव्य पथ समझाओगे?कान्हा अब तुम आओगे?अजब बात थी त्रेता द्वापर ,अब कलयुग के चंगुल का फेराकलयुग का त्रास मिटानेक्या कल्कि रूप में आओगे?कान्हा कब तुम आओगे?दरस को प्यासी तरसे अखियाँकब आ के दरस दिखाओगे?कान्हा तुम कब आओगे?✍️ डॉ सीमा अवस्थी 'मिनी' भाटापारा छत्तीसगढ़।*श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं और बधाई*....🙏

जन्मेजय (विष्णु) बड़े बड़े विषधर आए हैं, अपना फन फैलाने को, फन दिखाने लगी प्रदर्शिनी, लगा सपेरा लुभाने को, शुरू हुआ जब नाग नृत्य तब, जन्मेजय ने बाजी मारी, हवनकुंड में जा बैठा वो, दोनों एक दूजे पर भारी,। पड़ला देखो किसका होगा तय, पर जन्मेजय का पड़ला भारी। सबने मिलकर किया आह्वान, जन्मेजय का बलिदान करो, अपना वंश बचाने को, किसी का बलिदान करो। एक एक कर वार करें जब, स्वधा समाहित सभी हुए, जन्मेजय की आग में जलाकर, स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए। स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए। इस रचना का चुनावी राजनीतिक परिदृश्य से कोई संबंध नहीं ✍️ सीमा अवस्थी