"उल्लाला छंद विधान" (१००)

*उल्लाला शतकवीर के लिए सृजन*
*कलम की सुगंध छंद शाला मंच*

*उल्लाला छंद सृजन _  विधा १५/१३ मापनी*

1. *गणेश जी को समर्पित*
गणपति वंदन पहले करें,
बनते सारे काज है।
लंबोदर प्रभु विनती सुनो,
रखना मेरी लाज है।
*2. माँ शारदे को समर्पित*
माता विमला वरदायिनी,
जीवन मेरा सार दे।
विद्या का देकर ज्ञान माँ,
जीवन को आधार दे।।
*3 कलम की सुगंध को समर्पित* 
नित सीखे नूतन छंद है,
मिलता सबका साथ है। 
लेखन सुगंध बिखरे यहाँ,
रचना कारों के हाथ है।।
*4. गुरूदेव विज्ञात जी को समर्पित*
गुरुवर विज्ञात महान हैं,
देते नित नव ज्ञान हैं।
पथ भटके यदि लेखनी
देते हर छंद विधान हैं।।
*5. स्वयं को समर्पित*
अपनी गलती से ज्ञान ले,
 करना काम सुधार के।
संगत संतो की कर सदा
आता ज्ञान निखार के।
*६- मानव*
करता मानव अभिमान है,
झूठी तेरी शान है।
मिलना सबको है राख में,
मानव तू नादान  है।।
*7. बंधन*
जीवन पथ काँटों से भरा , 
मिलकर चलना साथ है।
आए जाए सुख दुख चले,
डोरी प्रभु के हाथ है। 
*8. होली*
 होली आयी रंगों भरी
 बिखरे सुंदर रंग हैं। 
 सबके मुख पर छलके खुशी,
 अपनों के जो संग हैं।
*9. निर्मल*
शीतल पावन धारा बहे,
 निर्मल जल की धार है।
गंगा का पावन तट दिखे
लगता मरुथल के पार है।
*10. करुणा*
 माँ  करुणा का सागर लगे,
 सबका रखती ध्यान है।
 हर संकट आंँचल से झले
 देती सबका ज्ञान है।।
11. *अनुपम*
    शोभा उपवन अनुपम दिखे
    बादल बरसे झूमके।
  अनुपम हरियाली मोहनी,
 अवनी देखो घूमके।।
*12. बाबुल* 
बाबुल का आंँगन छोड़ के
जाना तो ससुराल है।
भाई बहनों की लाडली,
 घुलमिल कर खुशहाल है।।
*13. बाती*
 दीपक में तो बाती जले,
बाती जलती तेल में।
गिरते उठते चलते रहें ,
जीवन के इस खेल में।।
*14. कलकल*
 नदियांँ बहती कलकल करे,
 धरती को है सींचती।
 सागर से जब जा मिले,
  बाँहें लगता खींचती।।
*15. उड़ना*
मन निश्चय से जब हो भरा,
अपने पर विश्वास हो।
वह पथ चलना आसान है,
कुछ मिलने की आस हो।।
*16 भारत* 
 भारत की पावन है धरा,
 पूजन करते राम का।
हनुमत खोजे माँ जानकी,
 माला जपती नाम का।।
*17. राहें*
 सपनों की बातें सच कहाँ,
 सच करते भगवान हैं।
 मिल राहें चलना हो कठिन,
 कानन पथ अनजान हैं।।
*18. कंटक*
कंटक सा जीवन पथ लगे,
चलना सच की राह में।
पीड़ा देती हैं भूल भी,
जब काँटें हो राह में।।
*19. चलना*
पगडंडी पर चलना पड़े,
शाला जाते गाँव में।
बरखा नदियाँ पूरी भरे,
तो आना जाना नाव में।
*20. बोली*
 बोली भाषा सबकी अलग,
बनती यह पहचान है।
बातें चाहे कैसी करो,
पूजे जाते भगवान है।
*21. अभिलाषा*
मेरी पूरी हो कामना,
बस यह अभिलाषा करूँ।
सेवा ही जीवन सार हो
 ऐसी मन आशा करूँ।।
*22. पूजन*
पूजन वंदन चंदन करें,
शिव पूजन दिन रात हो।
सावन की महिमा है बड़ी,
गिरिजा विषधर की बात हो।।
*23. बीमारी*
कोरोना बीमारी बड़ी,
खतरा सबको प्राण का। 
जीवन में खुशियाँ रहें,
चलना है पथ कल्याण का।। 
*24. मिलकर*
सागर में मिलकर सरि बहे,
कलकल करती गान है।
संगम पावन मेला लगे,
गंगा सागर मान है।।
*25. सपने*
आँखों में सपने पल रहे,
सपने सब साकार हो,
प्रभु ऐसी  हो शुभ भावना,
पूरा मेरा संसार हो।। 
*26.शीतल*
पूजन करते माँ शीतला,
शीतल भोजन भोग से।
मानव सब विनती करें,
 दूरी रखना रोग से।
*27. आपस*
आपस का बैर सही नहीं,
मिलिए सबसे नेह से,
भोजन करना सादा भला,
दिखती आभा देह में।।
*28. तुलसी*
प्रतिदिन तुलसी पूजन करो,
घर में सबके वास हो।
साधारण पौधा यह नहीं,
 प्रति रोधक गुण खास हो।।
*29. परिभाषा*
उपवन सौरभ मोहक लगे,
सुरभित गुण के साथ में।
गुण अवगुण परिभाषा बनें,
गिनती अपने हाथ में।।
*30. धरती*
धरती को हम माता कहें,
बलखाती नदियाँ यहांँ।
सबकी है जीवन दायिनी
बीती हैं सदियाँ यहाँ।।
*31. चूड़ी*
 खनके हाँथों में चूड़ियाँ,
 खनखन करती शोर है।
 गोरी की बाँहें हो भरीं
 चूड़ी बजती जोर है।।
*32. पायल*
प्रचलित गहना पायल बहुत,
नारी पहने पाँव में।  
रुनझुन की धुन सुनने मिले,
डोले गोरी गाँव में।।
*33. वेणी*
 गूंँथूँ मैं नित गजरा सखी,
वेणी का शृंगार है।
जूही चंपा मधुबन भरा,
 कलियाँ भी तैयार है।।
*34. माला*
 फूलों की  माला बन सजी,
माता के दरबार में।
मंदिर मंदिर सेवा करें,
माला लेकर हाथ में।।
*35. काजल*
नैनों को नित सुंदर करे,
काजल जो अंजन करे।
खंजर के तीखे वार से,
घायल मन रंजन करे।।
*36. माणिक*
माणिक रत्नों में श्रेष्ठ है,
आभा इसकी लालिमा।
धारण करता संसार है,
जब छाए ग्रह कालिमा।।
*37. गढ़ना*
गढ़ना हमको इतिहास है,
पढ़ लिख कर इस देश का।
अँधियारा करना दूर है,
 आगे बढ़ परिवेश का।।
*38. थाती*
माँ की थाती अनमोल है।
 देकर भेजी ससुराल जो ।
करना सबकी सेवा सदा।
 राहें वो खुशहाल हों।।
*39. भावी*
भावी नेता तुम देश के,
सेवा मन में ठान लो।
भूखा नंगा कोई न हो,
इतनी सेवा मान लो।।
*40. पारस*
पारस जैसे जग में रहो,
संगत गुण चमका करे।
जैसे चंदन शीतल करे,
लेपन मुख दमका करे।।
*41. वैदिक*
भारत का वैदिक काल से,
अपना ही इतिहास है।
भाषा गणना संस्कृति से,
करते आज विकास हैं ।।
*42. गुरुकुल*
गुरुकुल पढ़ने को जब गये,
अवधपुरी युवराज थे।
लेकर दीक्षा वापस हुए,
 करने कितने काज थे।।
*43. रिमझिम*
      बादल से बरसे नीर है,
      रिमझिम काली बदरिया।
     रे झीनी झीनी उड़ रही,
     भींगीं  मेरी चुनरिया।।
*44. पाठक*
  पाठक दैनिक अखबार के,
  नियमित अब मिलते नहीं।
 मोबाइल के दिन आ गये,
 जीवित सब दिखते वहीं।
*45. चिट्ठी*
अपनों के संदेशा लिए,
चिट्ठी बीते दौर की।
आती थी तब खुशियाँ मिलें,
कर बातें उस ठौर की।।
*46. विपदा* 
आती जब विपदा की घड़ी,
ईश्वर आते याद हैं।
पौधों के तन पोषण मिले,
देते जब हम खाद हैं।।
*47. लीला*
मानव मन माया का बना,
ईश्वर महिमा सार है।
गोकुल जोगी बन शिव गये,
लीलाधर अवतार है।
*48. गोदी*
माँ का आँचल प्यारा लगे,
गोदी बनती पालना।
माता होती पोषक सदा,
आती विपदा टालना ।।
*49. तुलना*
अपनी तुलना मत कीजिए,
करना अपना काम है।
दुनिया की टेढ़ी चाल में,
बिगड़े अपना नाम है।।
*50. कीचड़*
कीचड़ में खिलता कमल,
निखरे उसका रूप भी।
माता लक्ष्मी को प्रिय बहुत,
पूजन करता भूप भी।
*51.चाकर*
 चाकर करता है चाकरी,
 रहता बन रखवाल भी।।
 आँधी आए तूफान हो,
 करता सेवा ढाल सी।
*52- भरती*
गगरी भरने पनघट चली,
सखियांँ करती बात हैं।
आधी भरती जाती छलक,
सखियों का जो साथ है।।
*53. जगती*
जगती जीवन आधार है, 
जग की पालन हार है।
भारत भू सरयू पावनी,
पावन तट हरिद्वार है।।
*54. बचपन*
बचपन होता चंचल चपल,
खेलें सब मिल साथ में।
दिखती सूरज की लालिमा,
 लाली जैसे हाथ में।।
*55. झरना*
धारा जल की बहती चले,
टीलों से बहकर गिरे।
कलकल करता झरना बहे, नदियों से आकर मिले।।
*56. वाणी*
वाणी ऐसी तुम बोलना,
कानों को मधुरस लगे।
मुंँह से निकले जब बात जो,
बातें वो बतरस लगे।।
*57. पानी*
मानव तुम रखना याद की,
पानी जग आधार है।।
कीमत जो पहचाने वही,
यश का भागीदार है।।
*58. माया*
मेरा तेरा जग है करे,
अपना है कोई  नहीं।
माया तृष्णा दोंनों बसे,
तज दोनों सोई नहीं।।
*59. ज्वाला* 
दहके ज्वाला अवनी तपे,
भीतर लावा राख है।
 कुंदन सा तप ज्वालामुखी,
 बाहर उगले आग है।।
*60. पनपे*
पादप सा पनपे प्रेम है,
अंकुर होता बीज है।
अपनों से अपना बन मिले,
धोखा बनती खीझ है।।
*61. संकट*
संकट मोचन हनुमान जी,
 सालासर में वास है।
तुमको पूजे संसार है,
 जब-जब टूटे आस है।। 
*62. औषधि*
औषधि रोगों की है दवा,
करती तो उपचार है।
पीड़ा नाशक बन गोलियाँ,
जीवन का आधार है।
*63. कड़वी*
ककड़ी कड़वी खाओ नहीं,
कड़वा मुँह का स्वाद हो।
 बातें ऐसी करिए नहीं,
 बढ़ता मन अवसाद हो।।
*64. कलयुग*
 मानव मन लोभी हो गया,
कलयुग इस संसार में।
भाई भाई से लड़ रहा,
माया के बाजार में।।
*65. खिचड़ी*
   खिचड़ी का गुण समभाव है।
   करती सबसे मेल है।
खिचड़ी होती पाचक बहुत,
बनती यह बिन तेल है।।
*66. मारुति*
मारुति नंदन  हनुमान जी,
रखिए मेरी लाज जी।
तुमको सुमिरन निसदिन करूंँ,
होते सारे काज जी।।
*67. काँसा* 
जीवन शैली बदली हुई,
काँसा अब दिखता नहीं।
लोहा शीशा बर्तन बनें,
पीतल भी टिकता नहीं।।
*68. पनघट*
पानी भरने पनघट चली,
गागर लेकर हाथ में।
हँसते छलके ठोकर लगे,
चुनरी भींगीं साथ में।।
*69. आँचल*
लहरा के आँचल उड़ चला,
पुरवाई मधुमास की।
नयना भरते स्वप्न मधुर,
बातें दूरी पास की।।
*70. मधुबन*
महकी महकी मधुकामिनी,
खिलती कोमल डाल में।
नाचे मधुबन में मेहप्रिय,
रोए अपनी चाल पे।।
*71. शुभदा*
शुभदा  माता वरदायिनी ,
पावन तेरा धाम है।
करती  मैया सबका भला,
संकट हरणी नाम है।।
*72. गहरी*
     गहरी बातें समझें नहीं
   करती गहरे घाव हैं।
लहरों ऊपर बहती दिखे,
    ज्यों कागज की नाव है।।
*73. भाषा*
मेरी भाषा प्यारी बड़ी,
मिलता सबसे मान है।
संस्कृति शिक्षा आधार है,
भारत की जो शान है।।
*74. मंगल*
मंगल ही मंगल कर चले,
पूजूँ मैं हनुमान जी।
राम लखन माता जानकी,
भारत की पहचान जी।।
*75. साबुन*
साबुन धोए तन मैल है,
मन को तो धोए नहीं।
उजला मन रखिए सदा,
मन अनुरागी सोए नहीं।।
*76. यमुना*
 यमुना यमुनोत्री बन चली,
उत्तरकाशी गढ़वाल से।
काली कालिन्दी आ मिली,
पावन मंथर चाल से।।
*77. रोचक*
रोचक खबरें मिलती सदा,
टी वी सुन अखबार में।
लिखते रोचक रचना सभी
 नित कौशिक दरबार में।।
*78. अंबर*
        चमके अंबर तारों भरा,
        पूनम की जब रात हो।
        अवनी अंबर सुंदर दिखे,
        जब सावन बरसात हो।।
*79.रेखा*
कागज पर रेखा खींचके,
बनते गोलाकार हैं।
फूलों की माला गूंँथ कर ,
सजता बंदनवार है।।
*80. तीरथ*
गंगा सागर तीरथ बना,
काशी भोलेनाथ है।
यमुना मथुरा पावन बहे,
मुरली मोहन हाथ है।। *81मुखिया*
मुखिया घर के पापा हुए,
सबका रखते ध्यान हैं।
खुशियाँ छलके घर बारमें, सबकीउनसे शान हैं।।
*82. गुड़िया*
खेली गुड़ियों के साथ मैं ,
बचपन बीता प्यार से।
आती है बातें याद अब,
सागर के उस पार से।।
*83. रचना*
सुंदर चरित्र लेखन करें,
रचना बनती मनमोहनी।
निखरे रचना नवनीत सी।।
जैसे माखन हो दोहनी।।
*84.जननी*
जग जननी माँ कालिका,
सुमिरन सुखदायी लगे। 
संकट करता तांडव दिखे,
जीवन दुखदायी लगे।।
*85. सविता*
नभ को प्यारी लालिमा,
सविता किरणों से मिले।
पौ फटते खग उड़ने लगे,
सरसिज में सतदल खिले।।
 *86.शोणित*
शोणित काया दमके सदा,
रक्षक माँ नारायणी।
लोहित नैना है चंडिका,
पूजित माँ कात्यायनी।।
*87. साधक*
साधक‌ करते नित साधना ,
पूरी हो हर कामना।
विपदा आता जो भी कभी, 
संबल से कर सामना।।
*88. नीलम*
नीलम सा चमको नभ तले,
ग्रह नक्षत्र की चाल में।
बनकर माँ की शोभा मुकुट ,
नीलम चमके भाल में।।
*89 नवधा*
सबरी ने जोही बाट थी,
आए कुटिया राम तब। 
नवधा सेवा मन भाव से,
बनते सारे काम सब।।
*90. काली*
जग की विपदा हरने चली,
जन्मी काली रूपसी।
लोहित नैना अपराजिता,
मोहित दानव दूत भी।।
*91. भीनी*
भींगीं जल बूँदों से धरा,
भीनी तब पुरवाई लगे।
उठती सागर में जो लहर ,
कितनी सुखदायी लगे।।
*92. मानस*
रामचरित मानस राम का,
नित करता गुणगान है।
जन मानस रघु नायक बने,
कहता जग भगवान है।।
*93. टेसू*
खिलते टेसू सजती धरा,
वासंती सिंगार है।
पीली पीली सरसों खिले,
अवनी को उपहार है।।
*94.आतप*
दिनकर उगता आतप भरे, 
अवनी तपती रेत सी।
झुलसी तुलसी शापित करे,
दिखती बंजर खेत सी।।
*95. कारण*
कारण बनती है दीपिका,
अंधेरा छटने लगा।
खुशियाँ दूनी होती दिखे,
पौं ज्यों ज्यों फटने लगा।।
*96. अचला*
अचला माता संसार को,
देती जीवन मान है।
सहती कलुषित मन वेदना,
धात्री को वरदान है।।
*97. गुंजन* 
मधुकर गुंजन उपवन करे, 
छेड़े मधुरिम राग है।
धधके लावा अंतस भरे,
अवनी उगले आग है।।
*98. तारा*
आँखों का तारा सुत बने,
बेटी करती काज है।
कुलवधु बनती जिस देहरी,
रखती उसकी लाज है।।
*99.चातक*
चातक तकता भर लालसा,
बूँदें बरसे कब धरा।
पीकर तृप्ति की आस में,
 बूँदों से हीे मन भरा।।
*100. उल्लाला*
उल्लाला लिख पूरा किया,
चौकल मानक गेयता।
लिखना पढ़ना आने लगे,
मानक की उपदेयता।।

✍️स्वरचित,
 डाॅ. सीमा अवस्थी "मिनी"
भाठापारा ,३६गढ़।

Popular posts from this blog

"नारी सम्मान पर अभिव्यक्ति"

*जन्माष्टमी*कान्हा कब तुम आओगे ?दरस को प्यासी तरसे अखियाँ,कब आकर दरस दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ? अब धेनु नहीं कानन जाती,अब कहांँ माखन मिश्री दूध मलाई ?मुरली का जादू भी खो रहा,क्या मुरली अधर लगाओगे? कान्हा कब तुम आओगे ? हर कदम पर दुशासन दुर्योधन ,राह में शीश उठाते हैं।चीर हरण करने को आतुर,एक पल भी न घबराते हैं । शिशुपाल का वध करने को, क्या सुदर्शन चक्र चलाओगे?कान्हा कब तुम आओगे? घर घर हैं धृतराष्ट्र गांधारी,पुत्र प्रेम या सत्ता सुख हो,अनाचार की चलती आरी , क्या दंभी को सद्गमार्ग दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ?समाज हो रहा पथ भ्रमित, मानवता पर प्रपंची घेरा,गीता का ज्ञान सुनाकर,क्या कर्तव्य पथ समझाओगे?कान्हा अब तुम आओगे?अजब बात थी त्रेता द्वापर ,अब कलयुग के चंगुल का फेराकलयुग का त्रास मिटानेक्या कल्कि रूप में आओगे?कान्हा कब तुम आओगे?दरस को प्यासी तरसे अखियाँकब आ के दरस दिखाओगे?कान्हा तुम कब आओगे?✍️ डॉ सीमा अवस्थी 'मिनी' भाटापारा छत्तीसगढ़।*श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं और बधाई*....🙏

गीतिका