नवगीत
लाख जतन कर,
मन कब माने,
सपने बुनता,
बिन पहचाने।
लगी लगन मन,
साथी मितवा,
उड़ा परिंदा
साथ निभाने।
मन की दुनिया,
बहुत कठिन है,
बुनता माँझी
ताने बाने।
प्रीत अलग है,
जग की सीमा,
लाँघें रेखा,
मन को पाने।
अपनी ही धुन,
गढ़े घरौंदा,
रीत निराली,
चातक जाने।
✍️ सीमा अवस्थी
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