मुक्तक

१-
सतह पर तैरने से गहराईयाँ नहीं मिलती,
बरसाता हो जब पाला तो कलियांँ नहीं खिलती,
डूबना पड़ता है मंजिल की तलाश में,
यही वो सफर है जहां तन्हाईयाँ नहीं मिलती। 

२-
आज एक नई शुरुआत कर लूँ,
अपने आप से मुलाकात कर लूँ,
कुछ ख्वाब जिंदगी के अधूरे रह गये हैं,
क्यों न उन्हें पूरा करने का प्रयास कर लूँ।
   
 ३-     
गीली लकड़ी सा इश्क तुमने सुलगाया है।
न जल पाया है न बुझ पाया है ।
आईने में खुद को ही निहार लेते हैं ।
ये सोचकर कि तू मुझमें ही समाया है।

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"नारी सम्मान पर अभिव्यक्ति"

*जन्माष्टमी*कान्हा कब तुम आओगे ?दरस को प्यासी तरसे अखियाँ,कब आकर दरस दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ? अब धेनु नहीं कानन जाती,अब कहांँ माखन मिश्री दूध मलाई ?मुरली का जादू भी खो रहा,क्या मुरली अधर लगाओगे? कान्हा कब तुम आओगे ? हर कदम पर दुशासन दुर्योधन ,राह में शीश उठाते हैं।चीर हरण करने को आतुर,एक पल भी न घबराते हैं । शिशुपाल का वध करने को, क्या सुदर्शन चक्र चलाओगे?कान्हा कब तुम आओगे? घर घर हैं धृतराष्ट्र गांधारी,पुत्र प्रेम या सत्ता सुख हो,अनाचार की चलती आरी , क्या दंभी को सद्गमार्ग दिखाओगे?कान्हा कब तुम आओगे ?समाज हो रहा पथ भ्रमित, मानवता पर प्रपंची घेरा,गीता का ज्ञान सुनाकर,क्या कर्तव्य पथ समझाओगे?कान्हा अब तुम आओगे?अजब बात थी त्रेता द्वापर ,अब कलयुग के चंगुल का फेराकलयुग का त्रास मिटानेक्या कल्कि रूप में आओगे?कान्हा कब तुम आओगे?दरस को प्यासी तरसे अखियाँकब आ के दरस दिखाओगे?कान्हा तुम कब आओगे?✍️ डॉ सीमा अवस्थी 'मिनी' भाटापारा छत्तीसगढ़।*श्री कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं और बधाई*....🙏

गीतिका