गौरेया दिवस पर.....
*गौरेया*
गाँव अब शहर होने लगे,
पंछी आसरा (घोंसला) खोने लगे।
चींचीं करती फुदकती थी गौरैया,
अब कहीं दिखाई नहीं देती भैया।
भोर होते ही करती थी खुशियों का संचार,
घर की मुँडेर से आँगन में अपने पंख पसार।
अब छत पर रीता रहता है भगोना,
तुम बिन सूना सूना है घर का कोना।
दादी डालती थी आटे की गोलियांँ,
और चाँवल के दाने।
कुल्हड़ में पानी रखती बच्चों को पिलाने।
कभी चिड़ियों का परिवार आता हमें रिझाने
पंख फड़फड़ा कर जैसे जाल बिछाने,
चींचीं चूँ चूँ की भाषा में प्रेम सिखाने
टकटकी लगाए देखते हम तुम्हें बुलाने।
न कोई पिंजरा न घोंसला था घर में,
फिर भी तुम आती नित हमारे दर में।
भर उड़ान नापती घर का कोना कोना,
फुर्र फुर्र की आहट और चिड़ा से लड़ना,
चहचहाना रूठना फिर उड़ जाना।
दाना चुग्गा कर दर्पण में निहारना,
चोंच मारना और उड़ान भर आना जाना।
अब क्यों नहीं आती मेरे अँगना?
क्या अब लोग तुम्हें प्यार नहीं करते?
या तुम्हारा मन भर गया है।
इस तकनीकी युग में इंसान,बंधन गया है।
तुम्हें देखने का समय कहाँ,
तुम्हारी परवाह का दाना पानी कहाँ?
अब वो चींचीं का शोर थम गया है,
कोटर पोखर घर में अब तुम्हारा ठौर कहाँ?
प्यारी गौरैया अब क्यों नहीं आती?
पहले बहुत आती थी, याद मन से नहीं जाती।
गौरेया तुम क्यों नहीं आती?
तुम बिन जैसे छाई है उदासी।
✍️ सीमा अवस्थी
भाटापारा छत्तीसगढ़।