*विश्व कविता दिवस पर..*
*कविता दिवस क्या है....?*
मन की कोरी कल्पना में,
भर उठे हुँकार कविता।
मन में उठती नव तरंगें,
गढ़े मसीपथ ये ध्रुविता।
भाव की माला पिरोकर,
शब्दों से श्रृंगार करती।
छंद रस लय व्यंजना से,
कथ्य में वह प्राण भरती।
लेखनी भर भाव चलती,
बन पड़े कविता सुघड़।
हो कहीं जब सृजन बाधित,
लय भी जाती है उजड़।
निस्तेज हो जब भावना,
मसि मेरी सब रंग लिखती।
उमड़ घुमड़ कर मेघ जैसे,
नित नए सोपान गढ़ती।
क्षुब्ध मन अवसाद घेरे,
फूट पड़ते बोल हैं।
प्रेम की कोपल निकलती,
मंद मंद किलोल है।
एक कलिका काव्य की,
जब खिल उठे तो बोल कविता।
✍️ स्वरचित एवं मौलिक,
डॉ सीमा अवस्थी ,
भाटापारा,छत्तीसगढ़।