अनुभूति
तुम्हारी स्मृति,
जैसे किसी शिलालेख पर
उकेरी गई लिपि हो
मैंने सहेज रखी हैं मन में।
अनावरण पर,
जब शब्द उमड़ आते हैं,
तो रचती हूँ सुघड़ नई कविता,
पंछी हो तुम,
एक अपरिचित,
न जाने कैसे ?
चिर परिचित हो गये,
स्मरण भरे उस पल को,
विस्मित हो यही सोचतीं हूँ।
अधरों पर मुस्कान बिखेर,
ओझल हो जाते हैं।
मेरी लेखनी में तुम ,और
तुम्हारा जीवन्त प्रेम,
कब तक का साथ है,
यह पता नहीं
किन्तु जब तक तुम
हो स्पंदन में ,
लिखूँगीं हर दिन
एक नई कविता ।
प्रेम का मधुमास
और प्रीत की व्यथा,
संघर्ष का आनन्द, और
विषाद पतझड़ सा,
मन के कोरे कैनवास पर
उभरते जीवन के विविध रंग ,
सावन सा तुम्हारा अस्तित्व,
इसमें रंग में रंग मैं भी,
पंछी हो गई हूँ।
✍️ स्वरचित
डॉ सीमा अवस्थी 'मिनी'
भाटापारा, छत्तीसगढ़
१९मार्च२३