जन्मेजय
जन्मेजय (विष्णु)
बड़े बड़े विषधर आए हैं,
अपना फन फैलाने को,
फन दिखाने लगी प्रदर्शिनी,
लगा सपेरा लुभाने को,
शुरू हुआ जब नाग नृत्य तब,
जन्मेजय ने बाजी मारी,
हवनकुंड में जा बैठा वो,
दोनों एक दूजे पर भारी,।
पड़ला देखो किसका होगा तय,
पर जन्मेजय का पड़ला भारी।
सबने मिलकर किया आह्वान,
जन्मेजय का बलिदान करो,
अपना वंश बचाने को,
किसी का बलिदान करो।
एक एक कर वार करें जब,
स्वधा समाहित सभी हुए,
जन्मेजय की आग में जलाकर,
स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए।
स्वयं हवन कुंड में भस्म हुए।
इस रचना का चुनावी राजनीतिक परिदृश्य से कोई संबंध नहीं
✍️ सीमा अवस्थी